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मानव मस्तिष्क को पढ़ना अब संभव है

Biology, Research

हम सभी जानते हैं कि मस्तिष्क जानकारी प्रेषित करने से पूर्व उसे सँभालकर रखता है। आज से पहले मस्तिष्क में होने वाली गतिविधियों की जानकारी प्राप्तकर पाने के लिए हमारे पास बहुत कम साधन उपलब्ध थे। Rutgers University (Newark) और University of California के वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क की उस सुरक्षित जानकारी को प्राप्त करने की बहुत ही सटीक विधि खोज निकाली है जिसे आपका मस्तिष्क अगले ही क्षण प्रेषित करने वाला है। हमें मस्तिष्क के अंदर ले जानी वाली इस खिड़की के द्वारा हम मस्तिष्क की सभी आंतरिक क्रिया-कलापों को बहुत अधिक सटीकता से जान पाने समर्थक हो पायेंगे। इस महत्वपूर्ण खोज के पीछे प्रमुखत: तीन वैज्ञानिक हैं: Stephen José Hanson, psychology professor at Rutgers; Russell A. Poldrack, professor at UCLA, और Yaroslav Halchenko, (जो अब Dartmouth College में post-doctoral छात्र हैं), जिन्होंने functional magnetic resonance imaging (fMRI) द्वारा वह साक्ष्य प्रस्तुत किये हैं जिससे किसी भी व्यक्ति की मन:स्थिति को बहुत सटीकता (high degree of accuracy) के साथ जाना सकता है। साथ ही यह शोध दर्शाता है कि मस्तिष्क के क्रिया-कलापों को मैप (Map) करने के लिए व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है क्योंकि यह धारणा सच नहीं है कि मस्तिष्क के अलग-अलग भाग अलग-अलग कार्य संपादित करते हैं।

brainविगत वर्षों से न्यूरोइमेजिंग (neuroimaging) इसी क्षेत्र में केन्द्रित है कि विशिष्ट मानसिक गतिविधियाँ (जैसे पढ़ना, लिखना, डर और प्रेम) मस्तिष्क के कुछ निश्चित भागों द्वारा संपादित की जाती हैं। लेकिन यह शोध दर्शाता है कि मस्तिष्क बहुत जटिल (Complex) है, इसे सरल मॉडेल (Simple Model) द्वारा नहीं समझा जा सकता है। मानसिक गतिविधियों के विस्तृत अध्ययन से (analysis of global brain activity) से पता चला है कि विभिन्न संपादित कार्यों (Processing Tasks) का अपना एक अलग मस्तिष्क के आर-पार फैलता हुआ तंत्रिका संपर्क (neural connections) होता है, ठीक उसी तरह जैसे हर व्यक्ति के अंगूठे का अपना अलग निशान होता है। मस्तिष्क किसी स्थैतिक पैटर्न (Static Pattern) के बजाय मानसिक क्रियाकलापों के आधार पर ऐसे संपर्कों (connections) को व्यवस्थित और पुनर्व्यवस्थित करता है।

हम मस्तिष्क को इस तरह नहीं बाँट सकते हैं कि यह भाग हमारे विचार और वह भाग हमारा चरित्र निश्चित करता है। इस खोज से पता चला है कि हमारा मस्तिष्क अत्यन्त जटिल और लचीला (complex and flexible) है। भिन्न क्रियाकलापों के लिए यह तंत्रिका संपर्कको पुनर्व्यवस्थित (rearrange) कर सकता है। इन तंत्रिका संपर्क के पैटर्न का अध्ययन करके हम अत्यधिक दक्षता से हम यह पता कर सकते हैं कि मस्तिष्क द्वारा कौन-सा मानसिक कार्य संपादित किया जा रहा है।

इस शोध द्वारा मानसिक विकार जैसे आटिज़्म (autism) और स्किटसाफ्रीनीया (schizophrenia) के बारे में और अधिक सूक्ष्मता से जानकारी प्राप्त की जा सकेगी, जिससे उपचार सुविधापूर्वक किया जा सकेगा।

शोध दर्शाता है कि निश्चित मानसिक गतिविधियाँ मस्तिष्क के किसी एक हिस्से से सीधे संपादित नहीं होती हैं लेकिन तंत्रिका संपर्क का अद्वितीय पैटर्न मस्तिष्क की प्रभावशाली संपर्क को अधिक शुद्धता से मैप करता है। “Connection Project” के नाम से जाना जाने वाला यह प्रोजेक्ट (project) केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) की तंत्रिका सर्किटरी (neural circuitry) को पूरी तरह से मैप करने का प्रयास करेगा।

इस शोध में 130 लोगों पर परीक्षण किये गये, जिसमें हरेक ने अलग-अलग मानसिक कार्य किये, जैसे पढ़ना, तालिका याद करना, खर्चे और हानि का हिसाब रखना, इत्यादि शामिल है, इस पूरी प्रक्रिया के समय सभी की fMRI की गयी। एक प्रकार के कार्य के लिए 80% लोगों की fMRI करके एक जैसे पैटर्न प्राप्त किये गये। शोधकर्ता यह तक बता सकते हैं कि कौन क्या करने से पहले, अपनी नाक, कान, हाथ इत्यादि क्या देख रहा था? अब हम मस्तिष्क की गहराइयों में जाकर यह आपको पता लगने से पहले पता कर सकते हैं कि अब जो आप देख रहे हैं वह कुत्ता है या बिल्ली।

Hanson और उनका शोध समूह ऐसी प्रणाली विकसित करना चाहता है जो तंत्रिका संपर्क को जाँचकर उसका विवरण प्रस्तुत कर सके। ऐसा कर पाने पर हम विभिन्न मानसिक रोगों (e.g. Hyperactivity and Autism) का उपचार कर पायेंगे। वह ऐसी पुस्तक के बारे में भी सोच रहे हैं जिसमें न्यूरोइमेजिंग डेटा के आधार पर मानसिक स्थितियों का वर्गीकरण और पैटर्न अध्ययन के लिए उपयोग में आने वाले उपकरणों की जानकारी हो।

इस शोध समूह को U.S. Office of Naval Research, James S. McDonnell Foundation और National Science Foundation से अनुदान मिला है। McDonnell Foundation ने हाल ही में Hanson को 1 मिलियन डालर की अतिरिक्त राशि अनुदान में दी है ताकि वे इस क्षेत्र में और अधिक गति से कार्य कर सकें।

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23 Comments

  1. sadhak ummed singh baid (Reply) on December 11th, 2009 at 10:44 am

    आपके लेख पर सिद्धार्थ जोशी की ट्टिपणी सर्वाधिक महत्व पूर्ण है. मानव शरीर जङ परमाणु के विकास की अन्तिम अवस्था है, प्रकृति की सर्वोत्तम कृति. कबीर का प्रसिद्ध भजन झीनी चदरिया को शरीर और जीवन के संदर्भ में बार-बार समझना चाहिये. विज्ञान की पहुँच सिर्फ़ भौतिक-रासायनिक क्रियाओं तक है, जबकि मानव तन जीवन द्वारा संचालित है. जीवन मस्तिष्क के मेधस को माध्यम बनाकर प्राण द्वारा शरीर का संचालन करता है. विज्ञान इस विधा पर दिशाहीन है, वह कुछ नहीं कर सकता. दरासल यही विज्ञान और दर्शन का मिलन बिन्दु भी है. अकेली विज्ञान-चर्चा हल नहीं बन सकती. श्रीमान विनय प्रजापतिजी, आपका प्रयत्न स्तुत्य है, मगर अधूरापन तो आप भी महसूस करते होंगे. सहमत हों तो आपके निमन्त्रण का इन्तजार करूँगा. वैसे इस विषय पर एक महत्वपूर्ण गीत की सीडी भी मेरे पास है, किसी अल्पज्ञात साधक की रचना है, माँगें. धन्यवाद.

     
  2. देवबंद (Reply) on September 5th, 2009 at 8:40 pm

    विज्ञान की यह खोज एक नये युग का निर्माण कर सकती है

     
  3. स‌ंजय द्विवेदी (Reply) on September 5th, 2009 at 6:39 pm

    बहुत अच्छी जानकारी दी आपने। शुक्रिया।

     
  4. Darpan Sah (Reply) on August 28th, 2009 at 7:39 pm

    badhiya post.

    lekin eeka matalb ‘Sach ka samna’ mushkil ho jaiyega ?

     
  5. Darpan Sah (Reply) on August 28th, 2009 at 7:31 pm

    Tab to ‘sach ka saamna’ karna aur bhi mushkil ho jaiyega.
    phir ‘kaun banega karorpati’ ?

     
  6. Chjandra Mohan Gupta (Reply) on August 24th, 2009 at 11:46 am

    बढ़िया और लाजवाब प्रस्तुति देकर सबको खुश कर दिया……….

     
  7. Bhupender Singh (Reply) on August 22nd, 2009 at 10:55 pm

    वाह, यह तो ग़ज़ब की ख़बर है। ;)

     
  8. rajeev thepra (Reply) on August 22nd, 2009 at 10:54 pm

    gazab….bahut hi rochak….bahut hi gyaanvardhak…..!!

     
  9. Asha Joglekar (Reply) on August 22nd, 2009 at 8:30 pm

    Bahut badhiya aur naee jankari ke liye aapka shukriya. Yah shodhkary hee hai jo purane tathyaon ko nakar kar nayee nayee baten samane lata hai. Is jankari ke liye abahar.

     
  10. mahfooz (Reply) on August 21st, 2009 at 11:56 pm

    jaankari pradaan karne ke liye shukriya………

     
  11. शशि सिंघल (Reply) on August 21st, 2009 at 10:31 pm

    विनयजी मानव मस्तिष्क को पढ़्ने संबंधी जानकारी बेहद रोचक और ज्ञान को बढ़ाने वाली है \

     
  12. बेहद रोचक और नई जानकारी!!
    आभार्!

     
  13. माधवी (Reply) on August 20th, 2009 at 6:06 pm

    इस महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक लेख के लिए आभार।

     
  14. ज्ञानवर्धक जानकारी। मस्तिष्क से संबंधित जितने रहस्य सुलझेंगे उतना ही समझ पर पड़ा पर्दा भी हटता जाएगा।

     
  15. समीर लाल (Reply) on August 20th, 2009 at 6:03 pm

    बहुत अच्छी जानकारी दी-आभार.

     
  16. sharad kokas (Reply) on August 20th, 2009 at 5:31 pm

    यह आप ने बहुत अच्छी जानकारी दी है मै अन्द्धश्रद्धा निर्मूलन के तहत स्कूल कालेजों मे मस्तिष्क के क्रिया कलापों पर बात करता हूँ ( क्रपया मेरा ब्लॉग NAA JAADOO NAA TONAAदेखें.कृपया यह भी बतायें कि यह जानकारी किस जनरल मे कहाँ और किस तारीख को छपी है ताकि मै उसका रेफरेंस क्लास में दे सकूँ -शरद कोकास

     
  17. sidharth joshi (Reply) on August 20th, 2009 at 2:49 pm

    अब तक तो यही माना जाता रहा है कि दिमाग में विशेष तरह के ऑक्‍सीजन कैरियर बनने बंद हो जाने के कारण दिमाग का विशेष हिस्‍सा मरने लगता है। मरता हुआ दिमाग, जो आमतौर पर दाहिना भाग होता है नीयर डेथ एक्‍सपीरियंस पैदा करता है। यानि तेज रोशनी और एलीयन आवाजें। इस तरह स्किजोफ्रीनिया का मरीज हवा या दीवार में चित्र देखता है और अनजान लोगों की बातें सुनता है। कई बार वार्तालाप भी स्‍थापित कर लेता है। इस तरह स्किजोफ्रीनिया को साइको सोमेटिक डेमेज की तरह देखा जा रहा है। मरीजों को ऑक्‍सीजन कैरियर का काम करने वाली दवाएं देने पर उसे आराम भी आता है। अब देखते हैं नई रिसर्च में क्‍या वे इस पुराने तथ्‍य को झुठला देते हैं और नई दवा ईजाद कर लेते हैं क्‍या। अगर ऐसा होता है तो मुझे इस रिसर्च के जमीनी लाभों का इंतजार रहेगा।

    इस संबंध में किसी भी प्रकार की नई जानकारी हो तो उपलब्‍ध कराइएगा। मुझे इंतजार रहेगा। वैसे निजी तौर पर मेरा मानना है कि दिमाग के अध्‍ययन के विषय में अभी भी बस अंधेरे में टटोलने जैसी हरकतें हो रही हैं। पर ठीक है प्रयास तो हो ही रहा है।

    प्राणायाम से दिमाग के कई हिस्‍सों पर प्रभावी प्रभाव पड़ता है। और तो और प्राणायाम जेनेटिक डिसऑर्डर को भी दुरुस्‍त कर देता है। अब केवल सांस लेना यह कैसे संभव बनाता है यह मेरी समझ में नहीं आता। लेकिन यह स्‍पष्‍ट है कि हमारे प्राचीन ऋषियों ने प्रकृति के साथ ही कुछ ऐसी चीजें खोज ली थीं जिन्‍हें अब भुला दिया गया है। मुझे वहां अधिक रोशनी नजर आती है।

    स्किजोफ्रीनिया का उल्‍लेख करने के लिए आभार… यह मेरा पसंदीदा विषय है। मॉर्डन साइकोलॉजी को हर कोण से चैलेंज करता है।

     
  18. Dr.Arvind Mishra (Reply) on August 20th, 2009 at 11:30 am

    मष्तिष्क शोधों पर अद्यतन जानकारी ! शुक्रिया !

     
  19. ranju (Reply) on August 20th, 2009 at 11:20 am

    बहुत रोचक जानकारी है यह शुक्रिया

     
  20. seema gupta (Reply) on August 20th, 2009 at 9:27 am

    हैरत है ….बेहद रोचक जानकारी आभार….

    regards

     
  21. meenu khare (Reply) on August 20th, 2009 at 9:16 am

    very nicely ellaborated post.

     
  22. nirmla.kapila (Reply) on August 20th, 2009 at 9:05 am

    विनय जी बहुत बडिया जानकारी है आभार्

     
  23. हिमांशु (Reply) on August 20th, 2009 at 9:02 am

    मानव मस्तिष्क से संबंधित इस जानकारी का आभार ।

     

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