शैवाल या एलजी (Algae) छोटी जैविक फैक्टरियाँ हैं जो प्रकाश संश्लेषण द्वारा कार्बन डाइआक्साइड (Carbon Dioxide, CO2) और सूर्य प्रकाश को ऊर्जा में परिवर्तित कर देती हैं। यह सब इतना कुशलतापूर्वक होता है कि वे एक दिन में ही कई बार अपना भार दोगुना कर लेती हैं।
प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया के दौरान शैवाल तेल बनाती हैं और जो किसी पेड़-पौधे, जैसे मक्के (Corn) और स्विचग्रास (Switch-grass), द्वारा प्रयोग किए जाने वाली जैव-ईंधन (Bio-fuel) से प्रति एकड़ 15 गुना अधिक होता हैं। शैवाल खारे पानी, ताज़े पानी, और दूषित पानी में ( जैसे समुद्र, तालाब और खेती के लिए अनुपयोगी भूमि में) भी बढ़ सकती हैं।
इन सबसे भी अलग, कमसकम सैद्धांतिक रूप से शैवाल मलजल (Sewage) जैसे कार्बनिक पदार्थ और ग्रीनहाउस गैस यानि कार्बन डाइआक्साइड की अधिकता में और भी अच्छी गति से बढ़ती हैं।
Lisa Colosi, जो कि सिविल और पर्यावरण इंजीनियरिंग (Civil and environmental engineering) की प्रोफ़ेसर हैं, का कहना है कि ” हमें दो बातों की पुष्टि इसलिए करनी होगी कि हम सच में मुफ़्त दोपहर का भोजन प्राप्त कर रहे हैं” (We have to prove these two things to show that we really are getting a free lunch), जिसका तात्पर्य शैवाल का भोजन है। साथ ही Lisa Colosi, University of Virginia की उस शोध समूह की सदस्या हैं जिसे हाल ही में U.Va*. Collaborative Sustainable Energy Seed Grant (U.Va. सहयोगात्मक सतत ऊर्जा बीज अनुदान) से $30,000 की राशि प्राप्त हुई है।
अब यह शोध समूह, शैवाल जैव-ईंधन के उत्पादन को, कार्बन डाइआक्साइड और कार्बनिक पदार्थों की विभिन्न मात्राओं में उपस्थिति अर्थात् उसकी घट-बढ़ से होने परिवर्तनों को जाँचकर शैवाल (द्वारा) तेल पैदावार को बढ़ाने का प्रयास करेगा।
शैवाल द्वारा ईंधन उत्पादन के विषय में सन् 1950 से सोचा जा रहा है। U.S Department of Energy ने 1978 से 1996 तक इस पर अग्रणी अनुसंधान किया था। आज तक शैवाल ईंधन के सभी जुड़े अनुसंधान प्राकृतिक रूप से उपलब्ध कार्बन और सूर्य प्रकाश की उपस्थिति में ही किए गये थे। इस प्रकिया द्वारा जितना तेल का उत्पादन किया जा सका है वह शैवाल के कुल भार से लगभग 1% कम हैं।
U.Va. शोध समूह का मानना है कि अधिक कार्बन डाइआक्साइड और कार्बनिक पदार्थों की उपस्थिति में तेल उत्पादन को 40% तक बढ़ाया जा सकता है।
इस बात से औद्योगिक पारिस्थितिकी संभावनाओं (Industrial ecology possibilities) को बल मिलता है, क्योंकि यह अपशिष्ट जल शुद्धिकरण (Waste water treatment) में सहायक है जो कि अत्यधिक मंहगी प्रक्रिया है और यह कोयले द्वारा विद्युत उत्पादन से होने वाले प्रदूषण से भी हमें बचा जा सकता है जिसमें वायु में उपस्थित कार्बन डाइआक्साइड की अपेक्षा 10 से 20% अधिक कार्बन डाइआक्साइड होती है।
“औद्योगिक पारिस्थितिकी (Industrial ecology) का प्रमुख सिद्धांत अपशिष्ट पदार्थों को उपयोगी बनाना है।”
शोध सहभागी Mark White, जो कि McIntire School of Commerce के प्राध्यापक हैं, विचारों के तीन समुच्चय द्वारा soy-based bio-diesel की तुलना में algae bio-fuel के पर्यावरणीय और आर्थिक लाभ को quantify (मापना) करने में सहायता करेंगे।
Mark White शैवाल के उस आर्थिक लाभ का परीक्षण करेंगे जिसमें यदि राष्ट्र carbon cap-and-trade system लागू कर दे, तो इससे कार्बन डाइआक्साइड की खपत कर सकने के गुण के कारण शैवाल का मौद्रिक मूल्य बढ़ जायेगा। साथ ही वह नाइट्रोजन विनिमय (Nitrogen regulation)(क्योंकि शैवाल वायु और जल दोनों से नाइट्रोजन हटा सकती है) और तेल मूल्यों की निषेधात्मक स्तर तक बढ़त के कारण शैवाल ईंधन अर्थशास्त्र (algae fuel economics) पर पड़ने वाले प्रभावों पर भी विचार करेंगे।
तीसरे सदस्य Andres Clarens, जो सिविल और इंजीनियरिंग के प्रोफ़ेसर हैं, शैवाल से तेल को अलग करने में विशेषज्ञता रखते हैं।
शोध समूह अपना प्रयोग मात्र कुछ लीटर शैवाल से प्रारंभ करेगा। तेल उत्पादन को अनुकूलित करने के लिए व्यावहारिक इंजीनियरिंग दृष्टिकोण अपनाया जायेगा। जैसे शैवाल के भोजन अर्थात् कार्बनिक पदार्थ को यदि पीस लिया जाये तो क्या प्रभाव पड़ता है?
Colosi कहती हैं, ठोस अपशिष्ट और शैवाल, मृत या जीवित, सभी इस मीनू में हैं। “हम रात का पूरा भोजन (शैवाल पर) छोड़ने जा रहे हैं और देखते हैं कि क्या होता है?
इनमें से कुछ व्यवहारिक समस्याएँ Chevron और Shell जैसी बड़ी तेल उद्योग कम्पनियों और विभिन्न निजि कम्पनियों द्वारा पहले ही सुलझा ली गयीं हैं किन्तु इन बुनियादी बातों पर प्रकाशित वैज्ञानिक रिपोर्ट शैवाल जैव-ईंधन शोधकर्ताओं के लिए लाभकारी सिद्ध होंगी।
Colosi का मानना है, शैवाल तेल उत्पादन की प्रगति के समाने आये प्रमाण सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों को महत्वपूर्ण प्रयास करने के लिए प्रेरित करेंगे, चूँकि इस प्रौद्योगिकी के मूल तत्व बहुत आकर्षक हैं। शोध की सफलता U.S. Department of Engery जैसे अभिकरण (agency) द्वारा बड़े अनुदान के द्वार खोलेगी, और ‘pilot-scale शैवाल जैव-ईंधन’ छोटे स्तर पर तुरंत प्रभावकारी हो जायेगा, जिसे Shell और start-up firms द्वारा अनुदान मिल रहा है।
*University of Virginia
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Story by विनय प्रजापति
Tags: Algae, Andres Clarens, arbon cap-and-trade system, bio diesel, Bio fuel, Carbon Dioxide, CO2, environmental engineering, Industrial ecology, Lisa Colosi, Mark White, Nitrogen regulation, Photosynthesis, soy-based bio-diesel, U.Va., University of Virginia, कार्बन डाइआक्साइड, कार्बनिक पदार्थ, ग्रीनहाउस गैस, जल शुद्धिकरण, जैव-ईंधन, जैव-ऊर्जा, नाइट्रोजन विनिमय, प्रकाश संश्लेषण, शैवाल




तुलसी इस संसार में सबसे मिलिये धाइ|
ना जाने किस रूप में इंधन ही मिल जाइ||
अच्छा, ज्ञानवर्धक और उपयोगी लेख।
भैया जी, हिन्दी विकिपीडिया भी आपकी बाट देख रही है। आइये इसे ज्ञान-विज्ञान से भर दें। सब मिलकर हम हिन्दी को समृद्ध बना सकते हैं। कार्य करने से ही होता है, केवल मनोरथ से नहीं। अत: निवेदन है कि हिन्दी विकि (hi.wikpedia.org) पर पधारें; उसमें हिन्दी में अपनी विशेषज्ञता के टॉपिक्स पर कुछ लेखों का योगदान करें। हिन्दी को ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न करने के इस यज्ञ में आप भी आहुति दें।
Bio energy se dar sa lagta hai kahi computer aur machine ne hamari hi kheti karna shuru kar di to ? (matrix)
jokes apart Waht a good post….
….for further reading reader can always refer to Wikipedia.org.
your comment is really scaring.
oops…
अच्छा लगा जान कर.
{ Treasurer-T & S }
सही है, सूर्य से प्राप्त हो रही ऊर्जा को तेजी से संग्रहीत करने का भंडार है शैवाल। इस से ऊर्जा को पुनः प्राप्त किया जा सके तो यह बहुत उपयोगी साबित होगा। ऑक्सीजन की पुनर्प्राप्ति के लिए भी।
अद्भुत एवं रोचक जानकारी के लिए धन्यवाद
great post, amazing blog…
rochak hai mitr. pahli baar aana hua par aage aata rahunga ab.
very neat ,palatable and lucidly written article .lokpriy vijyaan lekhan is getting enriched day in and day out .veerubhai .
बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी व ग्यान वर्धक लेख के लिए सुक्रिया
जुलाई अंक के ‘SCIENTIFIC AMERICAN INDIA में इस रिसर्च के बारे में बताया गया है कि मिनितोब विश्वविद्यालय के रिचर्ड गोर्डन के साथ भारतीय वैज्ञानिक रामचंद्र, दुर्गा माधब महापात्र और कार्तिक बंद ने इस विषय पर प्रपत्र प्रकाशित किया है। ज्ञानवर्धक लेख के लिए आभार॥
Nice post with good way of presentation.
बिलकुल सही -स्पायिरुलिना का तो पूरा इस्तेमाल भी शुरू हो गया है
रोचक और तथ्यपरक जानकारी के लिए शुक्रिया